Homeनई दिल्ली

कृषि कानून के विरोध में भारत बंद : किसान आंदोलन के 4 महीने पूरे

ठंडे होते किसान आंदोलन में जान फूंकने के लिए बदली रणनीति

कृषि कानून के विरोध में भारत बंद  : किसान आंदोलन के 4 महीने पूरे

कृषि कानून के विरोध में भारत बंद  : किसान आंदोलन के 4 महीने पूरे, कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को रोका ठंडे होते किसान आंदो

नई सरकार का दिखने लगा असर :
केजरीवाल की उपस्थिति में पंजाब आप में शामिल हुए कुंवर विजय प्रताप
कृषि मंत्री बोले- हमने प्रस्ताव में सभी सवालों के जवाब दिए

कृषि कानून के विरोध में भारत बंद  : किसान आंदोलन के 4 महीने पूरे, कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को रोका

ठंडे होते किसान आंदोलन में जान फूंकने के लिए बदली रणनीति, किसान नेता अब डिसेंट्रलाइज्ड फॉर्मूले की बात कर रहे

नई दिल्ली : (पी9 ब्यूरो) : 

बॉर्डर पर जमे किसानों के लिए लंगर की व्यवस्था की गई है। देश के कई इलाकों से किसान यहां मदद पहुंचा रहे हैं।
आंदोलन स्थल पर खाने-पीने और नाश्ते की पूरी व्यवस्था की गई है।

कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन के 4 महीने पूरे होने पर संयुक्त किसान मोर्चा ने शुक्रवार को भारत बंद बुलाया। मोर्चा के मुताबिक, देश के तमाम किसान संगठनों, मजदूर संगठनों, छात्र संगठनों, बार संघ, सियासी दलों और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों ने उनके बंद का समर्थन कर रहे हैं। इस दौरान पंजाब में चंडीगढ़-अंबाला हाईवे पर प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को रोककर विरोध जताया।
किसान मोर्चा का कहना है कि इस बार बंद का दायरा ज्यादा बड़ा है। दुकानें, मॉल, बाजार बंद रखने के साथ ही तमाम छोटी-बड़ी सड़कें और ट्रेनें रोकी जा रही हैं। इस दौरान एम्बुलेंस और जरूरी सेवाएं को नहीं रोका जा रहा।

किसानों से शांति से प्रदर्शन करने की अपील

किसानों ने तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने, एमएसपी पर फसल खरीद के लिए कानून बनाने, किसानों के खिलाफ दर्ज सभी मामले खत्म करने, इलेक्ट्रिसिटी और पॉल्यूशन बिल वापस लेने और डीजल, पेट्रोल और गैस की कीमतें कम करने की मांग कर यह बंद बुलाया है।
संयुक्त मोर्चा का कहना है कि दिल्ली के पास किसान जिन सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं, वे पहले से ही बंद हैं। जो वैकल्पिक मार्ग बनाए गए हैं, उन्हें भी बंद किया जा रहा है। संगठन ने किसानों से अपील की है कि वे शांति से विरोध को सफल बनाएं। किसान मोर्चा की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि प्रदर्शनकारी किसी भी तरह की बहस और विवाद में शामिल न हों।
इस बीच सरकार और किसानों के बीच 11 दौर की बात हो चुकी है। सरकार की तरफ से आखिरी प्रस्ताव डेढ़ साल तक इन कृषि कानूनों को लागू न करने का दिया गया था। किसान और सरकार दोनों ही अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं। बॉर्डर पर धरना दे रहे किसानों की संख्या कम होती जा रही है। तो क्या किसान आंदोलन ठंडा पड़ता जा रहा है?
भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष राकेश टिकैत कहते हैं, ‘आंदोलन ठंडा बिल्कुल नहीं पड़ा है। सत्तासीन भाजपा ऐसा प्रचार कर रही है। मीडिया ने भी अब आंदोलन को थोड़ा कम दिखाना शुरू कर दिया है, लेकिन आंदोलन जैसे शुरू हुआ था उतने ही जोश से आगे बढ़ रहा है। और जब तक कृषि कानून वापस नहीं होते तब तक हम आंदोलन खत्म नहीं करेंगे।’
भारतीय किसान यूनियन के किसान नेता धर्मेंद्र मलिक बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘जो लोग यह सोच रहे हैं कि आंदोलन केवल बॉर्डर पर चल रहा है तो वे गलत हैं। अब यह आंदोलन हर राज्य में जिलावार स्तर पर चल रहा है। ताकि किसानों की खेती का भी नुकसान न हो और आंदोलन भी आगे बढ़ता रहे।’ किसान कहते हैं कि आंदोलन अब नई रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। तो क्या है किसान आंदोलन को आगे बढ़ाने का नया फार्मूला?

टेंट में बड़े-बुजुर्ग डेरा डाले हुए हैं। वहां उनके काम की हर चीज उपलब्ध कराई जा रही है।

किसान आंदोलन की नई रणनीति

किसान नेता राकेश टिकैत आज देहरादून के हरबसपुर में हैं। वहां वे स्थानीय किसानों के साथ अपनी मांगों और आंदोलन की आगे की रणनीति साझा करेंगे। भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के नेता धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, ‘किसान आंदोलन का अब विकेंद्रीकरण कर दिया गया। गन्ने की कटाई और गेहूं की बुआई के लिए किसानों को अपने गांव में भी रहना है तो दूसरी तरफ आंदोलन भी चलाना है। इसलिए वरिष्ठ किसान नेता जिलावार ढंग से जाकर बैठकें कर रहे हैं।’जिले में भी नीचे गांवों तक किसान संगठन के कार्यकर्ता बैठकों के लिए पहुंच रहे हैं। उत्तराखंड किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष भोपाल सिंह बताते हैं कि गांवों में चौपाल लगाकर हम किसानों तक पहुंच रहे हैं। उन्हें रोटेशन प्रक्रिया के तहत बॉर्डर आने की रणनीति के बारे में समझा रहे हैं। ताकि खेती का भी नुकसान न हो और आंदोलन भी ठंडा न पड़े।’

क्या है आंदोलन का ‘रोटेशन’ फार्मूला?

गाजीपुर बॉर्डर, टीकरी बॉर्डर और सिंघु बॉर्डर में आंदोलनरत किसानों की संख्या कम होने के बाद नई रणनीति बनाई गई। किसान नेता गांवों में चौपाल कर रहे हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में अब तक दर्जनों बैठकें हो चुकी हैं। इन बैठकों में गांव के स्तर पर 10-30 के समूह में किसानों के अलग-अलग दल बनाए जा रहे हैं। एक दल बॉर्डर पर जाता है तो दूसरा दल गांव में रहता है। ताकि आंदोलन और खेती साथ-साथ चलती रहे।
लोग घरों के स्तर पर भी आंदोलन में रोटेशन की प्रक्रिया के तहत शामिल हो रहे हैं। अमृतसर से आए बलजीत सिंह 13 मार्च को अपने गांव लौट गए। वह गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलन में 3 फरवरी से सक्रिय थे। जिस दिन बलजीत सिंह घर लौटे उसी दिन उनके बेटे तेजेंदर इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं। तेजेंदर 28 मार्च को यहां से घर लौटेंगे तो 1 अप्रैल को बलजीत सिंह फिर आंदोलन के लिए बॉर्डर पर आ आएंगे।

आंदोलन का किया जा रहा विकेंद्रीकरण

राकेश टिकैत कहते हैं, ‘हमने महीनों नहीं बल्कि सालों का प्रोग्राम बनाया है तो रणनीति भी उसी के हिसाब से बनानी होगी। बॉर्डर खाली न हों, इसके लिए रोटेशन के साथ ही आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए विकेंद्रीकरण यानी डिसेंट्रलाइज्ड प्रक्रिया भी अपनाई जा रही है।’अब तक सैकड़ों महापंचायत कम से कम 10 राज्यों में की जा चुकी हैं। आगे भी महापंचायत जारी रहेंगी। अब तक मध्यप्रदेश और उत्तराखंड में 4-4, उत्तर प्रदेश में 12, पंजाब में 20 से ज्यादा, हरियाणा में 3-31, राजस्थान में 10 कर्नाटक में 3, बिहार में 2 उड़ीसा में एक, बंगाल में तीन दिन के दौरान दर्जनों महापंचायत की गईं। भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के किसान नेता धर्मेंद्र मलिक कहते हैं कि देश के हर राज्य में आगे भी इसी तरह से महापंचायत होती रहेगी।किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी ने बताया कि वे पंजाब में अलग-अलग जिलों में अब तक दर्जनों बैठकें कर चुके हैं। चढ़ूनी कहते हैं, ‘आंदोलन में लोग कम नहीं हो रहे बल्कि एक रणनीति के तहत हम कुछ लोगों को गांव में और कुछ को बॉर्डर में रहने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। ताकि लोगों का काम-धंधा भी ठप न हो और आंदोलन भी चलता रहे।’
महापंचायत और चौपाल स्तर पर किसानों को आगे बड़े आंदोलन के लिए तैयार किया जा रहा है। जरूरत पड़ी तो इस बार 26 जनवरी से भी ज्यादा तादाद में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक के किसान दिल्ली में डेरा डालेंगे। किसान मंच के भोपाल सिंह कहते हैं, ‘ इस बार हजारों की तादाद में नहीं लाखों की तादाद में ट्रैक्टर दिल्ली में घुसेंगे।’

बॉर्डर पर चल रहा आंदोलन पड़ रहा फीका, घट रहे किसान?

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी कहते हैं, ‘किसान आंदोलन न फीका पड़ रहा है और न किसानों की संख्या घट रही है। 10 किसान अगर वापस जाते हैं तो 20 किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए आते हैं। सिंघु बॉर्डर पर इस वक्त भी 40 हजार से ज्यादा किसान आंदोलनरत हैं। इनमें से कुछ लोग दिनभर रहते हैं और रात में चले जाते हैं।’ धर्मेंद्र मलिक भी कहते हैं, ‘आंदोलनरत लोगों की एक सटीक संख्या नहीं बताई जा सकती, क्योंकि किसान लगातार आ-जा रहे हैं। ऐसा कोई रजिस्टर नहीं बनाया है, लेकिन गाजीपुर बॉर्डर में कम से कम 10 हजार तो सिंघु और टीकरी बॉर्डर में 30-30 हजार किसान अभी स्थायी तौर पर हैं।’

COMMENTS

WORDPRESS: 0
DISQUS: 0